देवाधिदेव श्री परशुराम महादेव-Mysadri.com

राजस्थान में पाली जिले के सादड़ी क़स्बे से 16km पूर्व दिशा की ओर दूर दूर तक फैली हुई शांत, एकांत और निर्जल प्रकृति की अनुपम छटा, झरनों और नालो की कल कल ध्वनि, सिद्धासन लगाकर बैठे हुए आत्मसाधको-सी हरी भरी अरावली पर्वत श्रृंखलाओ के बीच बिराज रहे है “देवाधिदेव श्री परशुराम महादेव”
 यह तीर्थ अपने प्राकृतिक आकर-प्रकार में विस्मयकारी होने से आकर्षण की विशेष केन्द्र रहा है. प्राकृतिक गुफा में बने प्रकृति निर्मित शिवलिंग के दर्शनार्थ प्रतिवर्ष हजारो लोग दूर-दूर स्थानों से आ कर अपनी मनोकमना करते है, जिसे मनोकामनाओ को ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र देवाधिदेव श्री परशुराम महादेव पूर्ण करते है.
  श्री परशुराम महादेव तीर्थ स्थल पहाड़ी पगडंडियों द्वारा इतिहास के प्रसिध्द कुम्भलगढ़ से 10km, केलवाड़ा से 11km और उदावाड़ से 5km दूर पड़ता है. उत्तर-पश्चिमी रेलवे की दिल्ली-अहमदाबाद रेलवे-लाईन पर मारवाड़ जक्शन और आबुरोड़ के बीच फालना रेलवे स्टेशन से 26km दूर सादड़ी पहुँचाने पर श्री परशुराम महादेव कुंड-धाम तक जाने का सफर सादड़ी से 12km है जिसके लिए टेक्सी, जीप, मोटर आदि विभिन्न प्रकार की सुविधाएं सादड़ी क़स्बे में उपलब्ध है. अत्यधिक पर्यटक, प्रकृति प्रेमी और दर्शनार्थी बड़े सवेरे सादड़ी से पैदल यात्रा भी करते है.
 सादड़ी से परशुराम की यात्रा के लिए प्रस्थान करने पर कुछ ही दूर “परशुराम की बगीची” नमक स्थान आता है. यहाँ एक शिव मंदिर विशाल वटवृक्षो की झुरमूट छाया में अपनी पुरानी स्मृति संजोये खड़ा है.
थोड़ी ही देर बाद देवाधिदेव श्री परशुराम महादेव तीर्थ को ओर आगे बढ़ने पर राजपुरा नामक एक छोटा सा गाँव आता है, गाँव के बाहर पहुचते ही बाई ओर की छोटी पहाड़ी की तलहटी में श्री शांतिनाथ भगवान का प्राचीन जैन मंदिर दिखाई देता है. कुछ आगे बढ़ने पर ही राजपुरा नामक छोटा बांध दिखाई देने लगता है. इसी रास्ते के बीच दो छोटी-सी बावड़ियाँ छतराबाव व हंजाबाव आती है.
  ठीक 11km तय करने के बाद “ धानों का वल्ला ” नामक स्थान आता हैं, भारी वाहन, बैलगाड़ियाँ आदि यही ठहर जाते है. यहाँ एक “श्री परशुराम महादेव अमरगंगा बाव’’ नाम की बावड़ी बनी हुई. यहाँ से पहाड़ी चढ़ाई प्रारम्भ होती है, धानों के वल्लो से आगे सर्पाकार सड़क के किनारे निलेश बाव एवं विश्राम-गृह दिखाई पड़ता है, जिसका निर्माण धर्मप्रेमी दानदाताओ ने यात्रियों की सुख-सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए करवाया हैं.
     रंग बिरंगे फल-फूलों एवं नाना प्रकार के वृक्षो से आच्छादित पहाड़ी मार्ग (लगभग 12km सादड़ी से) तय करने के बाद परशुराम महादेव की यात्रा का मुख्य द्वार और मुख्य विश्राम स्थल आ जाता है जिसे “कुण्ड” कहा जाता है. सभी सवारीयों को कुंड के पास ही छोड़ा जाता है. चारो ओर पहाडियों से घिरा यह स्थान अत्यंन्त रमणीय लगता है.
   कुण्ड के निकट पहुचते ही यात्री अपनी दाई और की पर्वतीय ढलान से छोटे जल प्रपात के रूप में पानी को गिरता हुआ देखकर अपनी सारी थकान भूल जाता है. कुण्ड के एक ओर हनुमानजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित की हुई है तो ऊपर की ओर विश्राम स्थलों के समीप एक नव निर्मित शिव मन्दिर है, जिसमे शिव, पार्वती, गणेश एवं परशुराम की सुन्दर मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की हुई है.
   यहाँ से परशुराम महादेव की मुख्य यात्रा लगभग 200 पक्की सीढियों की खड़ी चढाई से प्रारम्भ होती है. कुण्ड की व्यवस्था के लिए कुण्ड ट्रस्ट की सक्रीय रूप से अपनी योगदान दे रहा है, इसी ट्रस्ट के बदौलत यहाँ अनेक विकास कार्य संपन्न हो सके हैं जिससे यात्रियों की सुविधाओं में बहुत वृद्धि हुई हैं.
 लगभग 1km पहाड़ी चढाई के बाद नजर आता है एक आश्रम, यही है “अमरगंगा प्याऊ” यहाँ के दूध तलाई प्रांगन में प्रतिवर्ष मेले के अवसर पर श्री परशुराम महादेव अमरगंगा चेरीटेबल ट्रस्ट द्वारा एक विशाल भक्ति संगीत समारोह आयोजित किया जाता हैं. जिसमे राज्य के कोने-कोने से श्रेष्ठ भजन मण्डलीया आकर भाग लेती हैं, यहाँ पहुंचकर यात्री अपनी थकान व प्यास बुझाकर फिर से तरोताजा हो जाते है.
   यहाँ से थोड़ी रास्ता तय करने के पश्चात परशुराम महादेव की प्राचीन प्राकृतिक गुफा और विश्राम स्थल दृष्टिगोचर  होते है. लेकिन इस गुफा तक पहुँचाने के लिए पुन: 104 मीटर खड़ी ऊंचाई पर ले जाती है.
  परशुराम महादेव का यह धार्मिक, दर्शनीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण स्थल समुद्रतल से 3955 फिट ऊँचा है. इतने ऊँचे और दुर्गम रस्ते को भी बच्चे, बूढ़े, सभी यात्री “परशुराम महादेव की जय” और “जय शंकर बम भोले’’ आदि बोलते हुए आसानी से पार कर जाते है.
  कहा जाता है की परशुराम ने अपने फरसे के आघात से ही पहाड़ फोड़ कर यह गुफा बना ली थी और इसी में बने प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा कर शिव की आराधना और तपस्या करके देश के तत्कालीन अधिपतियों की प्रजा ध्वंसक नीति के विरुद्ध अपनी शक्ति संचय की थी तथा दुष्टों का संहार करके सर्वत्र विजय प्राप्त की थी.
  गुफ़ा में प्रवेश करते समय अलौकिक अनुभूति होती है, लगता है जैसे साक्षात् शंकर भगवान की गोद में प्रवेश करते है. यहाँ पहुँचाने पर मन को एक अपूर्व शांति मिलती हैं. गुफा के अन्दर ऊंचाईयों पर प्रकृति से बने कमलाकर गोमुख, गोधन और झूलते पत्थर सैकड़ों की संख्या में लटक रहें हैं इस से टपकने वाली जल की बुँदे महादेवजी का अभिषेक करती है.
 जिस प्रकार से यह गुफा प्राकृतिक है उसी प्रकार शिवलिंग भी प्राकृतिक है. जिस पर प्रस्तर पिंडिया है, जो शंकर, पार्वती और गणेश जी के आकर में बनी हुई हैं. एक ओर स्वामी कार्तिकेय की आकृति बताई जाती हैं, शिवलिंग में 9 खड्डे है, 9 भण्डार कहलाते है. पूरा शिवलिंग अन्दर से खाखला है उसमे पानी भरा रहता हैं.
 शिवलिंग के सामने ही पार्वती की संगमरमर की प्रतिमा प्रतिष्ठित है. प्रतिमा के पास एक कोने में अन्दर एक प्राकृतिक तलघर है, कहते हैं की इसी में बैठकर परशुराम ने तपस्या की थी. गुफा में 10-15 लोग आसानी से खड़े रहकर पूजा कर सकते हैं गुफा में आते ही मन पवित्रता से भर जाता है, दीप, धुप और चन्दन –केशर की सुगंध से वातावरण और भी पवित्र हो उठता है.
   परशुराम महादेव के इस पवित्र स्थल पर प्रतिवर्ष श्रावण-शुक्ल 6 व 7 को विशाल पैमाने पर मेला लगता है. इस मेले के अतिरिक्त कार्तिक पूर्णिमा एवं शिवरात्रि को भी मेला लगता है.  
 गुफ़ा मन्दिर तथा वहाँ बने आश्रम की व्यवस्था महादेव के महन्त एवं पुजारीगण परम्परागत रूप से करते आ रहे हैं, जब की केलवाड़ा और आस-पास के कस्बो व गाँवों के लोगों द्वारा गणित परशुराम महादेव सेवा मण्डल ट्रस्ट की ओर से भी इस तीर्थ के विकास के प्रयास किये जा रहे हैं.
परशुराम महादेव की यात्रा का बड़ा महत्व है, कहते हैं की हिमालय के गर्भ में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ बद्रीनाथ के पटद्वार खोलते समय ऐसे व्यक्ति से ही खुलवाने का नियम है जिसने परशुराम महादेव की यात्रा की हो.
प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस तीर्थ की यात्रा करने से उत्पन्न संतोष के कारण लौटते समय का कठिन रास्ता सहज ही कट जाता हैं इस पवित्र भूमि को छोड़ते समय ऐसा लगता है जैसे आज उन्होंने सब कुछ पा लिया हैं.

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